कटाव से दर्जनों परिवारों की स्थिति बद से बदतर हुई

पूर्णिया :- अमौर विधानसभा क्षेत्र से होकर बहने वाली कनकई, महानंदा, परमान, बकरा, दास आदि नदियों के तटों पर बसे दर्जनों गावों में न जाने कितने गावों का अब अस्तित्व समाप्त हो चुका है और कितने समाप्त होने के कगार पर हैं। कटाव से प्रभावित दर्जनों परिवारों की स्थिति बद से बदतर हो चुकी है और उसकी सुधि लेना शायद किसी ने गंवारा नही समझा। अमौर प्रखंड क्षेत्र के खाड़ी महीन गाव पंचायत अन्तर्गत बहने वाली कनकई नदी के तट पर बसा काशी टोला खाड़ी वार्ड संख्या एक ऐसा गांव है जो बीसवीं सदी के अंत में बसा था। उस समय इस गांव में एक सौ से अधिक परिवार रह रहे थे और गांव की आबादी तकरीबन चार सौ के आसपास थी। कनकई नदी के कटाव से विस्थापित होकर हरिपुर गांव से रमजान सहित दर्जनों परिवार किसी तरह मेहनत मजदूरी कर कुछ जमीन खरीदकर काशी टोला में आकर बस गए। क्षेत्र में कामकाज नही मिलने के कारण काशी टोला के प्रायः लोग दिल्ली, पंजाब में मजदूरी कर अपने परिवार का गुजर बसर करते आ रहे हैं। कटाव से प्रताड़ित रमजान के साथ गांव में बसे लोग अपने बच्चों को पढ़ा नही सके क्योंकि उनके पास सिवाय मजदूरी के कोई दूसरा कमाई का रास्ता नही गया था। रमजान के गरजने के बाद उनके पुत्र हजारी, इफ्तेखार, अशफाक ने मिलकर किसी तरह से साल 2010 में 50 डिसमिल जमीम खरीदी ओर दिन रात मेहनत मजदूरी कर घर बनाने के लिए रुपए जमा करने लगा। मेहनत मजदूरी कर जो कुछ भी इनलोगों के पास बचत घर बनाने के लिए जमा करने लगा और फिर धीरे धीरे तीनों भाइयो ने मिलकर साल 2015 में घर बनाया। उस समय उसके घर से कनकई नदी 500 मीटर की दूरी पर थी और उन्हें यह जरा भी इल्म होता कि चार साल बाद उसके बने बसाए आशियाना तहस नहस हो जाएगा तो कभी वे बनाने की सोचते भी नही। साल 2017 में प्रशासनिक स्तर पर हालांकि कटाव निरोधक कार्य होने से लोगो को लगा कि अब उन्हें कटाव से डरने की जरूरत नही है पर रख साल बाद ही होने वाले भीषण कटाव से इस गाव के सात से अधिक परिवार पूरी तरह से विस्थापित हो गए। एक वर्ष बाद भी जब उन्हें किसी भी प्रकार की कोई कही से सहायता नही मिली तो विवश होकर नदी से 20 मीटर की दूर हटकर एक बार फिर आश्रय लिए हुए है पर जिस तरह से इन दिनों भीषण कटाव जारी है उसे देखकर प्रतीत होता है कि इन परिवारों को विस्थापन का दर्द खैरात में मिला है जो न चाहते हुए भी हंसी खुशी सहना ही पड़ेगा। आज भी रमजान के परिजनों सहित तबरेज, रशीद, शफीक, ममनून आदि को यही लग रहा है कि प्रशासन उनकी खैर खबर लेंगे और उन्हें भी रहने के लिए जमीन मिलेगी।

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