आस्था रखे, अंधविश्वास नहीं- हरीन्द्रानंद

शिव शिष्य हरीन्द्रानंद फाउंडेशन, राँची के द्वारा में अंधविश्वास के खिलाफ एक जागरूकता अभियान के तहत “आस्था रखे, अंधविश्वास नही” विषयक एक बैठक का आयोजन नेतरहाट में आयोजित किया गया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरेण्य गुरूभ्राता श्री हरीन्द्रानन्द जी ने आस्था बनाम अंधविश्वास पर बालते हुए कहा आस्था सकारात्मक है और इसके विपरीत अंधविश्वास जीवन में कुण्ठा एवं निराशा उत्पन्न करता है। जीवन के हर पहलू पर व्यक्ति को वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। अंधविश्वास और अफवाहें सचमुच में एक व्याधि है जिसके निदान के लिए सबों को सजग रहना होगा और समाज में जागरूकता फैलानी होगी। सही गुरू का सानिध्य व्यक्ति को अंधविश्वासों से मुक्त करता है। श्री हरीन्द्रानंद जी ने बताया कि समाज में फैली कुरीतियों, कुसंस्कारों, अंधविश्वासों, अफवाहों के प्रति स्वच्छ जागरूकता पैदा करना एक-एक व्यक्ति का नैतिक कर्त्तव्य है।

शिव शिष्य हरीन्द्रानन्द फाउंडेशन के अध्यक्षा श्रीमती बरखा ने कहा शिव के शिष्य एवं शिष्याएँ अपने सभी आयोजन ‘‘शिव गुरू हैं और संसार का एक-एक व्यक्ति उनका शिष्य हो सकता है’’, इसी प्रयोजन से करते हैं। ‘‘शिव गुरू हैं’’ यह कथ्य बहुत पुराना है। भारत भूखंड के अधिकांश लोग इस बात को जानते हैं कि भगवान शिव गुरू हैं, आदिगुरू एवं जगतगुरू हैं। हमारे साधुओं, शास्त्रों और मनीषियों द्वारा महेश्वर शिव को आदिगुरू, परमगुरू आदि विभिन्न उपाधियों से विभूषित किया गया है।

शिव शिष्य परिवार के अध्यक्ष प्रो० रामेश्वर मंडल ने कहा कि शिव केवल नाम के नहीं अपितु काम के गुरू हैं। शिव के औढरदानी स्वरूप से धन, धान्य, संतान, सम्पदा आदि प्राप्त करने का व्यापक प्रचलन है, तो उनके गुरू स्वरूप से ज्ञान भी क्यों नहीं प्राप्त किया जाय? किसी संपत्ति या संपदा का उपयोग ज्ञान के अभाव में घातक हो सकता है। उन्होंने कहा कि हरीन्द्रानन्द जी कहते है कि शिव जगतगुरू हैं अतएव जगत का एक-एक व्यक्ति चाहे वह किसी धर्म, जाति, संप्रदाय, लिंग का हो शिव को अपना गुरू बना सकता है। शिव का शिष्य होने के लिए किसी पारम्परिक औपचारिकता अथवा दीक्षा की आवश्यकता नहीं है। केवल यह विचार कि ‘‘शिव मेरे गुरू हैं’’ शिव की शिष्यता की स्वमेव शुरूआत करता है। इसी विचार का स्थायी होना हमको आपको शिव का शिष्य बनाता है।

शिव का शिष्य होने में मात्र तीन सूत्र ही सहायक है।
पहला सूत्र:- अपने गुरू शिव से मन ही मन यह कहें कि ‘‘हे शिव! आप मेरे गुरू हैं। मैं आपका शिष्य हूँ। मुझ शिष्य पर दया कर दीजिए।’’
दूसरा सूत्र:- सबको सुनाना और समझाना है कि शिव गुरू हैं; ताकि दूसरे लोग भी शिव को अपना गुरू बनायें।
तीसरा सूत्र:- अपने गुरू शिव को मन ही मन प्रणाम करना है। इच्छा हो तो ‘‘नमः शिवाय’’ मंत्र से प्रणाम किया जा सकता है।
इस बैठक में समीपवर्ती क्षेत्रों से लगभग दो सौ लोग शामिल हुए। इस कार्यक्रम में अन्य वक्ताओं ने भी अपने -अपने विचार दिए।

इस आयोजन में शिव शिष्य हरीन्द्रानंद फाउंडेशन के मुख्य सलाहकार श्री अर्चित आनंद ने कहा कि अफवाहों से बचे एवम अफवाहों को फैलने से भी रोके, ये एक ज़िमेदार नागरिक का कर्तव्य भी है।

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