उच्चतम न्यायालय ने सुन्नी बोर्ड को एएसआई कि रिपोर्ट पर सवाल उठाने पर फटकारा

on friday  the centre   s lawyer told the court that the government would need 10 more days from the l


अयोध्या में खुदाई के बाद हिंदू मंदिरों के प्रमाण होने की संबंधी पुरातत्व विभाग (एएसआई) की रिपोर्ट पर सवाल उठाने पर उच्चतम न्यायालय ने सुन्नी बोर्ड को फटकारा और कहा वह इस रिपोर्ट पर सवाल नहीं उठा सकते। उन्हें ट्रायल कोर्ट में सवाल उठाने चाहिए थे तब उठाए नहीं, अब उन्हें अपीलीय अदालत में ऐसा नहीं करने दिया जा सकता। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की पीठ ने कहा कि सुन्नी सेंट्रल बोर्ड की वकील मीनाक्षी अरोड़ा से कहा कि एएसआई की रिपोर्ट और उसके निष्कर्षों पर सवाल उठाने का हक नहीं है। शीर्ष अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट में वह दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश 26, रूल 10(2) के तहत इस रिपोर्ट पर सवाल उठा सकते थे। लेकिन इस अधिकार को उन्होंने हाईकोर्ट में नहीं इस्तेमाल किया, इसलिए अब उन्हें इस रिपोर्ट की सत्यता पर सवाल नहीं उठाने दिया जा सकता। 

बोर्ड की वकील मीनाक्षी अरोड़ा ने सवाल किया था कि हाईकोर्ट में दी गई एएसआई रिपोर्ट के निष्कर्षों पर रिपोर्ट तैयार करने वाले विशेषज्ञों (बीआर मनी और हरिमांझी) के हस्ताक्षर नहीं हैं। और निष्कर्ष तथा मुख्य रिपोर्ट में एकरूपता का अभाव है। 
र्हाइकोर्ट ने 2003 में पुरातत्व विभाग से अयोध्या में विवादित स्थल की खुदाई कर यह पता लगाने के लिए कहा था कि यहां कोई मंदिर था या नहीं। इस रिपोर्ट को कोर्ट कमिश्नर की रिपोर्ट माना और इस पर सवाल जवाब करने की अनुमति नहीं दी। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि सीपीसी के आदेश 26, रूल 10 के अनुसार कोर्ट द्वारा मांगी गई रिपोर्ट कोर्ट का रिकॉर्ड हो जाती है जिस पर सवाल जवाब करने के लिए पक्षों को अनुमति नहीं है। फिर भी आप हमें इस बात पर संतुष्ट कीजिए कि पहली अपील पर हम आपको क्यों सुने, क्योंकि नियम के मुताबिक ये विशेषज्ञ सबूत हैं। 
मीनाक्षी अरोड़ा कल इस पर अपनी बात रखेंगी। अरोड़ा ने कहा कि रिपोर्ट में यह नहीं बताया कि वहां मंदिर किसने और किस काल मे बनाया। विक्रमादित्य कई राजाओं की पदवी रही है। ये दावा ठोस नहीं है। खुदाई के दौरान मिले सबूतों के कालखंड निर्णय करना ज़रूरी है जिससे निर्माण काल का पता चलता है।
जस्टिस एसए बोबड़े ने कहा कि यहां इसकी क्या अहमियत होगी। नीचे मंदिर का ढांचा तो मिला है। उसके निर्माण किस कालखंड में हुआ यह अहम नहीं है। सुनवाई के दौरान अरोड़ा ने कहा कि यहां पहले ईदगाह थी जिसे बाद में मस्जिद में तब्दील किया गया। क्योंकि 1523 में बाबर के आने से पहले भारत में दिल्ली सल्तनत का राज था और इस हिस्से में मुस्लिम मौजूद थे। इस पर जस्टिस भूषण ने कहा कि ईदगाह का मुद्दा आपकी लिखित दलीलों में नहीं था, यह बात गवाहों ने कही है जिसका कोई अर्थ नहीं है। 

मंगलवार को यह स्वीकारने के बाद कि विविादित स्थल पर रामचबूतरा ही रामजन्म स्थान है सुन्नी व×क्फ बोर्ड के वकील जफरयाब जिलानी गुरुवार को कहा कि रामचबूतरे को भगवान राम का जन्मस्थान नहीं मानते। उन्होंने कहा कि मंगलवार को वह 1886 के जिला अदालत का आदेश की जानकारी दे रहे थे जिसमें यह कहा गया है। इस पर जस्टिस बोबड़े ने कहा कि इसका मतलब 1886 का जिला जज का फैसला आज भी बरकरार है। क्योंकि इसे किसी ने चुनौती नहीं दी।

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