दल-बदल के बाद यदि टिकट नहीं मिले तो क्या होगा

रांची: झारखंड में विधानसभा चुनाव की घंटी कुछ ही दिनों में बजने वाली है। चुनावी मैदान में उतरने के लिए प्रदेश के अलग विधानसभा क्षेत्र से धुरंधर उतरने के लिए तैयार हैं, लेकिन चुनाव मैदान में किस पार्टी से उतरे इसका वे खासतौर पर समीक्षा कर रहे हैं। वैसे भाजपा पहली पसंद बन रही है, इसलिए तो प्रदेश भाजपा कार्यालय से लेकर दिल्ली तक कार्यकर्ता टिकट की जुगाड़ में चक्कर काट रहे हैं। लोकसभा चुनाव में एक्जिट पोल के मुताबिक ही भाजपा को बहुमत मिला था। इससे राजनीतिक कार्यकर्ताओं में भाजपा से टिकट लेने की होड़ मची हुई है। कलतक भाजपा को कोसने से जो राजनीतिक कार्यकर्ता थकते नहीं थे वे आज जय श्रीराम का माला जाप रहे हैं। उन्हें झारखंड के विकास से नहीं अपना विकास से मतलब है। हवा का रुख के अनुरूप उन्होंने भी अपना राह बदल लिया है। जी हां हम बात कर रहे हैं झारखंड में हाल के दिनों में पांच विपक्षी विधायकों की, जिन्होंने एक झटके में अपना पाला बदल लिया है। पिछले चुनाव में भाजपा के खिलाफत कर जीते थे। इसबार भाजपा का गुणगान कर जनता को रिझाएंगे। खैर चुनाव की घंटी अभी तक बजी नहीं है, लेकिन तैयारी चल रही है। अब टिकट की बात की जाए तो इसकी क्या गारंटी है कि जिन्होंने पाला बदला हैं भाजपा उन्हें टिकट दे ही देगी। यदि ऐसा नहीं हुआ तो भाजपा के लिए यह सभी सिरदर्द साबित हो सकते हैं। यदि भाजपा ने इनलोगों को टिकट दे दिया तो भाजपा में इतने सालों से पार्टी का झंडा टांगने वाले भीतरघात कर सकते है। वे नहीं चाहेंगे कि बाहर के लोग चुनाव जीते। यानि दोनों तरफ भाजपा की किरकिरी होनेवाली है। वहीं लोहरदगा विधानसभा की बात करें तो यहां से वर्तमान में सुखदेव भगत विधायक हैं। वे पिछली बार कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े थे। उन्होंने आजसू के कमल कशोर भगत की पत्नी नीरू शांति को पराजित किया था। इसबार सुखदेव भगत भाजपा की टिकट से लोहरदगा में उतरेंगे। लोहरदगा आजसू का सीटिंग सीट रहा है। आजसू इसबार भी अपने प्रत्याशी को उतारेगा। ऐसे में भाजपा और आजसू में इस सीट को लेकर मामला उलझेगा। मांडू विधानसभा क्षेत्र से झामुमो से भाजपा में शामिल जेपी पटेल इसबार मांडू से भाजपा की टिकट पर चुनाव लड़ेंगे। वहां कांग्रेस के महेश सिंह से उनका मुकाबला होगा। झारखंड मुक्ति मोर्चा भी जेपी पटेल के भाई को टिकट दे सकता है। भाजपा में भी पहले से टिकट की आस में पूराने कार्यकर्ताओं के अरमानों पर पानी फिर जाएगा। यहां भी भाजपा की किरकिरी हो सकती है। इसके अलावा बरही विधानसभा की बात करे तो वहां भी चुनावी परीक्षा में फर्स्ट और सेकेंड आनेवाले दोनों उम्मीदवार अब एक ही पार्टी में हैं और कोई किसी से कम नहीं है। बरही से भाजपा के उम्मीदवार उमाशंकर अकेला ने 2009 में उस वक्त के कांग्रेस के उम्मीदवार मनोज यादव को 8,085 वोट से हराया था। भाजपा को 60,044 तो कांग्रेस को 50,733 वोट मिले थे, लेकिन 2014 के चुनावी रण में कांग्रेस के मनोज यादव ने भाजपा के उमाशंकर अकेला को पटखनी दे दी। जीत का अंतर 7,085 था। कांग्रेस के मनोज यादव को 57,818 तो भाजपा के उमाशंकर अकेला को 50,733 वोट मिले थे। ऐसे में दोनों चाहेंगे कि बरही हरहाल में उन्हीं के पास रहे।

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