झारखंड जनाधिकार महासभा की चुनौती, भाजपा सरकार राष्ट्रवाद नहीं, जनमुद्दों पर चुनाव लड़कर दिखाए

रांची: कई जन संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मंच झारखंड जनाधिकार महासभा ने विधानसभा चुनाव से पहले सरकार की नीतियां, कामकाज और फैसलों पर नजरिया सामने रखा है। इसके साथ ही महासभा ने भाजपा की सरकार को चुनौती दी है कि वो राष्ट्रवाद और ध्रुवीकरण की राजनीति नहीं, जनमुद्दों पर विधानसभा चुनाव लड़के दिखाए। दरअसल झारखंड में भी भाजपा अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए एनआरसी और 370 को मुद्दा बनाकर लोगों का धु्रवीकरण करने की कोशिश कर रही है। महासभा से जुड़े अंबिका यादव, भारत भूषण चौधरी, कुमारचंद्र मार्डी, तारामणि साहु, पल्लवी प्रतिभा और जियाउल ने रांची में प्रेसवार्ता कर कहा कि रघुवर दास की नेतृत्व वाली भाजपा सरकार झारखंड की पहली सरकार है जिसने अपने पांच सालों का समय पूरा किया। यह एक मौका था राज्य को नई दिशा देने एवं न्याय और समानता आधारित विकास की ओर ले जाने का, लेकिन भाजपा शासन के पांच सालों में भ्रष्टाचार और जनविरोधी विकास को बढ़ावा मिला। महासभा के प्रतिनिधियो ने आरोप लगाया कि सत्ता में आने के कुछ दिनों में ही भाजपा सरकार ने छोटानागपुर और संथाल परगना काश्तकारी अधिनियमों को बदलने की कई कोशिशें की। इसका मुख्य उद्देश्य था खेती योग्य भूमि को गैर खेती ’व्यावसायिक’ इस्तेमाल में बदलना एवं इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण को आसान करना, लेकिन व्यापक जनविरोध के कारण सरकार इन कानूनों को बदलने में सफल नहीं हुई। इसके बाद सरकार ने भूमि अधिग्रहण कानून में ग्रामसभा द्वारा अनुमोदन एवं सामाजिक व पर्यावरण प्रभाव आंकलन के प्रावधानों को कमजोर कर दिया। सरकार ने गोड्डा में अडानी परियोजना के लिए आदिवासियों की सहमति के बिना उनकी जमीन को अधिग्रहित कर ली। भाजपा सरकार द्वारा आदिवासियों और मूलवासियों की सार्वजनिक जमीन जैसे नदी, सड.क, तालाब, धार्मिक स्थल आदि को लैंड बैंक में डालना भी कंपनियों के लिए बिना ग्रामसभा की सहमति के जमीन अधिग्रहित करने का एक तरीका है। पूर्ण बहुमत के बावजूद भी पेसा और पांचवी अनुसूची के प्रावधानों और कानूनों को लागू नहीं किया। साथ ही इस सरकार की एक और प्रमुख पहचान रही कि अल्पसंख्यकों पर लगातार हमले होते रहे एवं धार्मिक ध्रुवीकरण की कोशिशें की गईं। पिछले पांच वर्षों में कम से कम 21 लोगों को भीड़द्वारा पीट-पीटकर मारा गया है। इनमें मुस्लिम और आदिवासियों की संख्या 13 तक है। भाजपा शासन में लोकतांत्रिक अधिकारों पर दमन में काफी बढ़ोतरी हुई है। खूंटी के ही कम से कम 14000 ग्रामीणों पर देशद्रोह के आरोप पर प्राथमिकी दर्ज की गई है। कई सामाजिक कार्यकर्ताओं पर केवल फेसबुक पर पत्थलगड़ी गांवों में सरकारी दमन पर सवाल उठाने के लिए देशद्रोह का मामला दर्ज किया गया है। महासभा के प्रतिनिधियों का कहना है कि पिछले पांच सालों में लोगों के सामाजिक-आर्थिक अधिकारों का भी व्यापक उल्लंघन हुआ है। सरकार ने लाखों योग्य परिवारों का राशन कार्ड, सामाजिक सुरक्षा पेंशन व नरेगा जॉब कार्ड रद कर दिया, क्योंकि वे आधार से जुड.े नहीं थे। जनवितरण प्रणाली में आधार आधारित बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण व्यवस्था के कारण अनेक कार्डधारियों को राशन लेने में कठिनाओं का सामना करना पड.ता है। लाखों योग्य परिवार अभी भी राशन से वंचित हैं, क्योंकि सरकार ने राशन कार्ड की सूची, जो 2011 के सामाजिक-आर्थिक जनगणना पर आधारित है, को अपडेट नहीं किया है। वृद्ध, विधवा व विकलांग लोगों की लगभग आधी आबादी सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजनाओं के दायरे से बाहर हैं। महासभा ने कहा है कि काम की अनुप्लब्द्धता और मजदूरी भुगतान में देरी के कारण नरेगा की स्थिति बेहद खराब है। पिछले कई सालों से नरेगा में मजदूरी दर के वास्तविक स्तर में बढ़ोतरी नहीं हुई है। पिछले पांच वर्षों में आदिवासी और दलित परिवारों का कुल नरेगा मजदूरी में हिस्सा 50 प्रतिशत से गिरकर 36 प्रतिशत हो गया है। इन उल्लंघनों और नीतियों के कारण रघुवर दास के कार्यकाल में कम से कम 22 लोगों की भूख से मौतें हुई हैं।

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