भाजपा–आजसू को 62 लाख वोट मिले, पर सीट 27, झामुमो गठबंधन ने 53 लाख वोट में झटके, मिले 47 सीट

रांची:  छह महीने पहले लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की प्रचंड लहर पर सवार भाजपा के लिए झारखंड विधानसभा चुनाव धक्का देने वाला साबित हुआ है। साथ ही सरकार और लोकसभा चुनाव में भाजपा साथ चली आजसू के लिए भी नतीजे बेहद परेशान करने वाले हैं। कुल 62 लाख 41 हजार 907 वोटर हासिल कर भाजपा को 25 और आजसू को 2 सीटों पर जीत मिली है। इधर, झामुमो गठबंधन झामुमो-कांग्रेस-राजद को 53 लाख 19 हजार 472 वोट लेकर 47 सीट झटकते हुए सरकार बनाने में कामयाब हुआ है। भाजपा को विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा 50 लाख 22 हजार हजार 374 वोट ’33.4 प्रतिशत’ मिले हैं, जबकि आजसू पार्टी को 12 लाख 19 हजार 533 ’8.1 प्रतिशत’ वोट मिले हैं। भाजपा अकेले 79 और आजसू भी अकेले 53 सीटों पर चुनाव लड़ी है। उधर, झामुमो को 28 लाख 17 हजार 442 ’18.7 प्रतिशत’, कांग्रेस को 20 लाख 88 हजार 863 ’13.9 प्रतिशत और राजद को 4 लाख 13 हजार 167 ’2.7 प्रतिशत वोट मिले हैं। झामुमो 43, राजद 7 और कांग्रेस 31 सीटों पर चुनाव लडी थी। जाहिर है भाजपा और आजसू को इसका अंदाजा नहीं था कि अलग चुनाव लड़ने से चोट इतनी गहरी होगी। यह चोट ऐसी कि जब-जब पुरबईया बहेगी, दर्द सताएगा। वोटों के समीकरण पर गौर करें तो दर्जनभर से ज्यादा सीटों पर एनडीए में वोटों के बंटवारे का लाभ गठबंधन को साफतौर पर मिलता दिखाई दे रहा है।

पहली दफा बड़ा उलटफेर: अलग राज्य गठन के बाद अबतक किसी दल ने झारखंड में अकेले दम बहुमत का आंकड़ा जुटाने में नाकाम रहा है। इससे पहले 2014 के चुनाव में भाजपा को सबसे ज्यादा 37 सीटों पर जीत मिली थी, जबकि इसबार के चुनाव में सबसे ज्यादा झामुमो को 30 सीटों पर जीत मिली है। झारखंड मुक्ति मोर्चा के राजनीतिक इतिहास में यह अबतक की सबसे बड़ी जीत है। अलग राज्य में ही पहली दफा कांग्रेस 16 सीटें जीतने में कामयाब रही है। इधर, भाजपा को 11 सीटों का नुकसान हुआ और पाला बदलकर जो विधायक भाजपा में आए उन्हें संख्या के हिसाब से जोड़ दें तो भाजपा को 22 सीटों का नुकसान हुआ है। वहीं इसबार के विधानसभा चुनाव परिणाम ने आजसू को 14 साल पीछे लाकर कड़ा कर दिया है। जब 2005 में उसे दो सीटों पर जीत मिली थी। 2014 के चुनाव में भाजपा के साथ गठबंधन कर महज 8 सीटों पर चुनाव लड़कर आजसू ने 5 पर जीत दर्ज की थी। जीत-हार का फासला और समीकरण यह भी बता रहे हैं कि गठबंधन का वोट एक दूसरे दल में ठीकठाक ढंग से ट्रांसफर हो सका है और इंटैक्ट भी रहा है, जबकि भाजपा और आजसू ने आपस में ही एक दूसरे के वोट पर ज्यादा सेंधमारी की है। भाजपा और गठबंधन की चर्चा में झारखंड विकास मोर्चा की चर्चा भी प्रासंगिक है कि उसने सभी 81 सीटों पर 8 लाख 20 हजार 757 वोट ’4.5 प्रतिशत’ हासिल किए, जबकि तीन सीटों पर जीत मिली।

लोकसभा चुनाव का रिकॉर्ड ध्वस्त: लोकसभा चुनाव में भाजपा 11 और सहयोगी आजसू को एक सीट पर जीत मिली थी। अहम बात यह रही कि प्रचंड मोदी लहर पर सवार भाजपा-आजसू को झारखंड में रिकॉर्ड 82 लाख 72 हजार 582 वोट मिले थे। तब प्रचार में भी भाजपा के साथ आजसू ने भी जोर लगाया था। भाजपा और आजसू को 63 विधानसभा क्षेत्रों में विपक्षी दलों के उम्मीदवारों से अधिक वोट मिले थे, जबकि राज्य में 81 विधानसभा क्षेत्र हैं और तब विपक्ष में विधायकों की संख्या 32 थी। लोकसभा चुनाव में ही विपक्ष के गठबंधन में झाविमो भी शामिल हुआ था। तब कांग्रेस, झामुमो, झाविमो और राजद को कुल 47 लाख 49 हजार 657 वोट मिले और दो सीटों पर जीत मिली। चाईबासा में कांग्रेस की गीता कोड़ा और राजमहल में झामुमो के विजय हांसदा जीते। लोकसभा चुनाव में ही विपक्ष के शिबू सोरेन, सुबोधकांत सहाय, बाबूलाल मरांडी, मनोज यादव, चंपई सोरेन सरीखे दिग्गज चुनाव हार गए, लेकिन वोट खत्म होने के बाद तक विपक्षी दलों के रणनीतिकारों और उम्मीदवारों को इसका अभास नहीं था कि ईवीएम खुलेगा तो एकतरफा भाजपा का ही जिन्न निकलेगा, जबकि विधानसभा चुनाव में ईवीएम खुले तो गठबंधन के पक्ष में जिन्न निकलता चला गया।

हद तक साफ कर दिया: इसबार विधानसभा चुनाव के नतीजे ने हद तक साफ कर दिया है कि भाजपा को अगर सरकार और खासकर मुख्यमंत्री रघुवर दास के खिलाफ चली हवाओं का नुकसान उठाना पड़ा है तो उसके लपेटे में आजसू भी आई है, जबकि चुनाव प्रचार में आजसू ने एकसाथ भाजपा और गठबंधन के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था। कई सीटों पर दूसरे दल से ही आए सही, आजसू ने दमदार उम्मीदवार उतारे। तमाम कोशिशों के बाद वोट के आंकड़े आजसू के पक्ष में रहे, लेकिन सीट निकालने में वह फंसती-उलझती रही और इस फिसलन के केंद्र में भाजपा और आजसू के वोट जोड़ देने से काफी अहम दिखाई दे रहे हैं। आंकड़े ये भी बताते हैं कि अगर दोनों साथ लड़ते तो तस्वीर कुछ और हो सकती थी, लेकिन इस हाल के लिए आजसू के लोग भाजपा को ही जिम्मेदार मानते रहे हैं। आजसू ने शुरुआती दौर में 17 सीटों पर दावेदारी की थी, लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी बात बिगड़ती चली गई। भाजपा चक्रधरपुर छोड़ना नहीं चाहती थी, तो आजसू चंदनक्यारी और लोहरदगा को लेकर रिजीड थी।

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