बस कह देना कि आउंगा का लोकार्पण

रांची: श्रीमती नंदा पांडेय के काव्य संग्रह ’बस कह देना कि आउंगा’ का लोकार्पण विश्व पुस्तक मेले दिल्ली में रविवार को हुआ। नंदा पांडेय काफी समय से लेखन में सक्रिय हैं। इनकी कविताएं पत्र-पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती है। साहित्य के प्रचार-प्रसार में भी वो काफी सक्रिय भूमिका निभा रहीं हैं। इस संग्रह में ये धैर्य दिखाया है। प्रेम में, ये टू मिनट नूडल्स वाला फास्ट फूड टाइप प्रेम नहीं है। ये वो प्रेम है जो एक जीवन क्या कई जीवन भी प्रतीक्षा कर सकता है। इनकी कविताओं में प्रेम में नदिया की रवानगी नहीं है, झील सा ठहराव है। अपनी पहली कविता संग्रह ’बस कह देना कि आउंगा’ में कविता से प्रेम में धैर्य आने तक की जो यात्रा इन्होंने की है, वो इस संग्रह में परिलक्षित है। अपनी काव्य यात्रा के बारे में नंदा लिखती हैं कि पतझड़ में पत्तों का गिरना, अंधेरी रात में परछाइयों का गहराना, परिंदों का घरौंदा बनाना और घरौंदे का अपनाप बिखर जाना, ऐसी कितनी ही बातें बहा ले जाती मुझे, हवा के झोंकों की तरह और मेरी विस्फारित आंखें वीरान कोनों में अर्थ खोजने लगती हैं। इन्हीं वीरान कोनों में अर्थ खोजने के दौरान कई बार खुल जाती है स्मृतियों की पिटारी। जैसे किसी ने अनजाने में कोने में रखे किसी सितार को छेड़ दिया हो। इस आरोह-अवरोह में झंकृत हो उठी हो, अंतर्मन की शांत दुनिया। क्या प्रेम को पूरी तरह से व्यक्त किया जा सकता हैं, नहीं कितना भी व्यक्त करने का प्रयास किया जाए कुछ तो अव्यक्त रह ही जाता है। ये प्रेम है ही ऐसा। गूंगे के गुण जैसा कुछ कहना चाहती थी वो, पर जाने क्यों, कुछ कहने की कोशिश में बहुत कुछ छूट जाता था। उसका करीने से सजाने बैठती उन यादों से भरी टोकरी को जिसमें भरे पड़े थे। उसके बीते लम्हों के कुछ रंग-बिरंगे अहसास कुछ यादें-कुछ वादे और भी बहुत कुछ। कवयित्री नंदा ने अपनी काव्य क्षमता का प्रदर्शन केवल भाव और शब्द सौंदर्य से ही नहीं करती, अपितु उसमें प्राण का संप्रेषण करने के लिए प्रकृति का मानवीयकरण भी करती हैं। श्रीमती नंदा पांडेय मोराहाबादी रांची में रहती हैं।

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